
सावित्री व्रत, जिसे सावित्री ब्रत भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है जिसे विशेष रूप से महिलाएं अपने पतियों की लंबी आयु और खुशहाल जीवन के लिए करती हैं। यह व्रत ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को किया जाता है। इल वर्ष ये पर्व कल यानि 6 जून को माने जायेगा। इस साल ज्येष्ठ अमावस्या तिथि पांच जून की शाम सात बजकर 54 मिनट पर शुरू हो रही है और अगले दिन 6 जून की शाम 06 बजकर 07 मिनट पर इसका समापन होगा। इस दिन महिलाएं उपवास रखती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण करती हैं। इस लेख में हम सावित्री व्रत की कथा, इसके नियम, और इसकी विधि के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे।
सावित्री व्रत की कथा
सावित्री व्रत की कथा महाभारत के वनपर्व में मिलती है। यह कथा राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री और उनके पति सत्यवान के बारे में है। कथा कुछ इस प्रकार है:
राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। देवी सावित्री ने प्रसन्न होकर उन्हें पुत्री का वरदान दिया। समय आने पर, रानी को एक कन्या हुई जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और धर्मपरायण थी।
सावित्री विवाह योग्य हुई तो राजा अश्वपति ने उसके लिए योग्य वर की खोज शुरू की। किन्तु सावित्री ने स्वयं सत्यवान नामक वनवासी राजकुमार को पति रूप में चुना। सत्यवान एक वीर, धर्मात्मा और प्रकृति प्रेमी युवक था, किन्तु एक दुखद भविष्यवाणी के कारण उसके जीवन की आयु मात्र एक वर्ष शेष थी। सावित्री ने इस बात की परवाह न करते हुए सत्यवान से विवाह किया।
विवाह के बाद, सावित्री अपने पति सत्यवान के साथ वन में रहने लगी। एक वर्ष बाद, जिस दिन सत्यवान की मृत्यु की भविष्यवाणी की गई थी, उस दिन सावित्री ने व्रत रखकर सत्यवान का साथ देने का निश्चय किया। सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गया और वहीं अचेत होकर गिर पड़ा। यमराज सत्यवान की आत्मा को लेने आए तो सावित्री ने उनका पीछा किया और उनकी स्तुति की।
सावित्री की भक्ति और समर्पण से प्रभावित होकर यमराज ने उसे वरदान मांगने का कहा। सावित्री ने पहले अपने ससुराल को नेत्र ज्योति, फिर सौ पुत्र और अंत में अपने पति सत्यवान का जीवन वापस मांगा। यमराज ने उसके सभी वरदान स्वीकार किए और सत्यवान को जीवनदान दिया। इस प्रकार सावित्री ने अपने पति सत्यवान को मृत्यु से पुनः प्राप्त किया।
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सावित्री व्रत का महत्व
सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत न केवल पति की दीर्घायु के लिए किया जाता है, बल्कि यह महिलाओं को धैर्य, समर्पण और निष्ठा का प्रतीक भी बनाता है। सावित्री का साहस और उसकी निष्ठा हर स्त्री के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इस व्रत के माध्यम से महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम और विश्वास को और अधिक मजबूत करती हैं।
इस प्रकार, सावित्री व्रत हिन्दू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो हर वर्ष ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को मनाया जाता है। इस व्रत के माध्यम से महिलाएं अपने परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करती हैं।
सावित्री व्रत(Savitri Vrat 2024) के लिए नियम
- उपवास: इस दिन महिलाएं उपवास रखती हैं। कुछ महिलाएं निर्जल व्रत रखती हैं जबकि कुछ फलाहार करती हैं।
- पूजा की तैयारी: महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं।
- पूजा स्थल: घर में या किसी पवित्र स्थल पर सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं।
- सामग्री: पूजा के लिए आम के पत्ते, फूल, धूप, दीप, मिठाई, फल और सावित्री व्रत कथा पुस्तक की आवश्यकता होती है।
- कथा का श्रवण: पूजा के दौरान सावित्री व्रत की कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है।
- दान: पूजा के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र दान दिए जाते हैं।
सावित्री व्रत की विधि
- स्नान और शुद्धिकरण: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल की तैयारी: पूजा के लिए एक साफ स्थान पर पवित्र आसन बिछाएं और सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- कलश की स्थापना: एक ताम्र या मिट्टी के कलश में जल भरकर, आम के पत्ते और नारियल रखें।
- पूजा सामग्री की व्यवस्था: धूप, दीप, चावल, फूल, मिठाई, फल, और सावित्री व्रत कथा पुस्तक को पूजा स्थल पर रखें।
- आवाहन: देवताओं का आह्वान करें और उन्हें आसन दें। विशेषकर सावित्री और सत्यवान का स्मरण करें।
- पूजा और अर्चना: आम के पत्ते और फूलों से प्रतिमा की पूजा करें। धूप, दीप जलाएं और मिठाई अर्पित करें।
- कथा का श्रवण: सावित्री व्रत की कथा का पाठ करें या सुनें। कथा सुनने के बाद कथा समाप्ति पर श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
- आरती: आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
- दान: ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, और अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करें।
- व्रत का समापन: व्रत का समापन अगले दिन प्रातः फलाहार के साथ करें।