
वृंदावन। आज एक ऐसे ही प्रश्न का उत्तर हम आपके लिए लेकर आए हैं जिसका जवाब हिंदुओं के साथ साथ मुस्लिम समाज के लोगों को भी अध्यात्म जगत में चलने के लिए मार्ग दर्शन करेगा।
जी हां, जब प्रेमानंद महाराज की एकांतिक वार्ता में एक मुस्लिम भक्त पहुंचा तो महाराज जी ने उसको भी ऐसे आशीर्वचन दिए जिससे उसके जीवन को अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। तो चलिए जानते है मुस्लिम शख्स और उससे प्रश्नों के बारे में…..
एकांतिक वार्तालाप में एक मुस्लिम भक्त जावीर खान ने महाराज जी के पूछा कि, “महाराज जी, मुझे पता है कि यह काम गलत है और इसे करने से मुझे पछतावा होगा, फिर भी मैं उसे कर देता हूं। और जो सही है, उसे करने में मुझे खुशी मिलेगी, वो मैं नहीं कर पाता। ऐसा क्या करना होगा कि जो चाहूं वही कर पाऊं?”
तब महाराज जी मुस्कुराए और बोले, आपका प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसका उत्तर कई बार दिया जा चुका है। परन्तु, इसे समझना और अपने जीवन में उतारना ही असली चुनौती है। जो हम जानते हैं कि नहीं करना चाहिए, पर उसमें सुख बुद्धि रहती है, जैसे हम मानते हैं कि गलत है पर उसमें सुख मिलेगा – यह अंदर छुपी हुई वासना है। हम गलत नहीं करना चाहते, पर हमें वह सुख भोग की लालसा गलत काम करने के लिए प्रेरित करती है।”
“यह सुख बुद्धि और लालसा हमारे अंदर गहरे छुपी होती है। इसे हटाने के लिए हमें ज्ञान की जरूरत है। और वह ज्ञान प्राप्त होता है भगवान के प्रेमी जनों के वचन सुनने और नाम जप करने से। सत्संग सुनना बहुत महत्वपूर्ण है।”
जावीर खान ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, “महाराज जी, मैं मुस्लिम हूं। क्या मेरे लिए भी यही उपाय है?”
महाराज जी ने गंभीरता से उत्तर दिया, “बच्चा, भोजन पाना होता है न, उसमें हिंदू मुस्लिम होता है क्या?…. हम सब एक ही भगवान के बच्चे हैं। जैसे उच्च कोटि के महापुरुष हैं, वे कभी ऐसे आचरण का आदेश नहीं करेंगे कि आप गंदा व्यभिचार करो, आप गंदे आचरण वाले बनो। अगर आप अपने ही ग्रंथ को पढ़ें और उसके आचरण उतारें, तो आप पाएंगे कि सभी महापुरुष एक ही बात सिखाते हैं – नाम सुमिरन और सेवा।”
“देखो, हमने सद् ग्रंथों को पढ़ा है, गुरुवाणी जी को पढ़ा है, और सभी जगह एक ही सार पाया है – भगवान का सुमिरन और सबकी सेवा। इसी से भगवान की प्राप्ति होती है। अगर आप ब्रह्मचर्य, संयम, और नाम जप का पालन करेंगे, तो आप तेजस्वी और बलवान हो जाएंगे।” आपने सही बात को पकड़ा है कि जो करना चाहिए, वह मन नहीं करता और जो नहीं करना चाहिए, वह मन करता है। यह भगवान की कृपा है कि आपने इस बात को पकड़ा। अब इसे पूर्ण करने के लिए, आपको अपने इष्ट का नाम जपना होगा और अच्छे आचरण बनाना होगा।”
महाराज जी ने आगे कहा, “बच्चा, किसी को दुख मत दो। अगर आपके शरीर को दुख दिया जाए, तो आपको दुख होता है न? वैसे ही किसी भी शरीर को दुख दोगे, तो वह पाप बनेगा और आपको उसे भोगना पड़ेगा। अच्छे आचरण करने वाले को अच्छा फल मिलता है, बुरा करने वाले को कभी अच्छा फल नहीं मिल सकता।”
“यह जितना भी भेद है, यह हमारी तुम्हारी बुद्धि में है। अगर हम दोनों खड़े हो जाएं, तो कहां माथे पर लिखा है कि तुम और हो और हम और हैं? हम सब एक ही प्रभु के अंश हैं, कोई अंतर नहीं। अंतर केवल दिमाग में है, और यह भेद दिमाग में भर दिया जाता है। जैसे नए-नए बच्चे हैं, कोमल हृदय हैं, अगर उन्हें विरोध भावना से भर दिया जाए, तो उनके अंदर विरोध भाव आ जाएगा। अगर समभाव भर दिया जाए, तो वे उतने ही महान बन जाएंगे।”
आखिर में महाराज जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बच्चा, खूब नाम जप करो और अच्छे आचरण से चलो। अगर कोई प्रश्न हो, तो आकर पूछ लो। बहुत अच्छा, हृदय से स्वागत है आपका।”
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