
वायनाड। पिछले दिनों केरल के वायनाड में आई आपदा ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। इस भयंकर त्रासदी के बाद भी बचाव और राहत कार्य अभी भी जारी है। भूस्खलन के कारण आई इस आपदा में 300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। भारतीय सेना, राज्य पुलिस और एनडीआरएफ की टीमें दिन-रात लोगों को बचाने के अभियान में जुटी हुई हैं।
आपदा के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी संपर्क पुल का निर्माण, जो भूस्खलन में नष्ट हो गया था। भारतीय सेना ने 31 घंटे बिना रुके काम करके 190 फीट लंबा बेली ब्रिज तैयार किया, जिससे कई लोगों की जान बचाई जा सकी। इस टीम में मेजर सीता अशोक शेल्के ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनकी सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ हो रही है। मशहूर उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी मेजर सीता की सराहना की है।
वायनाड में त्रासदी के बाद राहत कार्य
30 जुलाई की सुबह वायनाड जिले के मेप्पाडी के पास पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की तीन बड़ी घटनाएं हुईं। मेप्पाडी, मुंडक्कई टाउन और चूरलमाला में बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ। इसके चलते स्कूल और आसपास के घरों में पानी और कीचड़ भर गया, जिससे भारी तबाही मची। इस घटना ने दो गांवों चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच संपर्क भी तोड़ दिया।
आपदा के 13 घंटे बाद एनडीआरएफ और सेना की टीम मुंडक्कई पहुंची, जो चूरलमाला से 3.5 किलोमीटर दूर है। भूस्खलन से आई तबाही ने 300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली है, जबकि सैकड़ों लोग घायल हैं और अस्पतालों में इलाज चल रहा है। अभी करीब 300 लोग लापता हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने बताया कि अब तक 148 शव बरामद किए जा चुके हैं। 10,042 लोग 93 राहत कैंपों में रह रहे हैं। रेस्क्यू अभियान में 1,419 लोग लगे हुए हैं और ड्रोन आधारित रडार जल्द ही तैनात किए जाएंगे।
राहत कार्य में पुल का महत्व
भूस्खलन से तबाह हुए चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच संपर्क बहाल करने के लिए भारतीय सेना ने बेली ब्रिज का निर्माण किया। सेना के इंजीनियरिंग टास्क फोर्स मद्रास इंजीनियर ग्रुप (एमईजी) के अधिकारियों ने 31 जुलाई की सुबह नौ बजे पुल पर काम शुरू किया और 31 घंटे बिना रुके काम करने के बाद 1 अगस्त को शाम छह बजे पुल तैयार हो गया। 190 फीट लंबा यह बेली ब्रिज 24 टन वजन उठा सकता है और बचाव अभियान में तेजी ला सकता है।
मेजर सीता की भूमिका
मेजर सीता अशोक शेल्के ने इस पुल के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। महाराष्ट्र के अहमदनगर की रहने वाली 35 वर्षीय मेजर सीता हमेशा से ही सैनिक बनना चाहती थीं और उन्होंने सेना में करियर बनाने के लिए मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया। उनके नेतृत्व में सेना की टीम ने कठिन परिस्थितियों में भी बिना रुके काम किया और पुल का निर्माण पूरा किया।



मेजर सीता का अनुभव
मेजर सीता ने कहा, “हम नुकसान और तकलीफ देख रहे थे और हम आराम नहीं कर सकते थे। हमारे सेना के जवान पहले से ही प्रेरित हैं और हम उन्हें प्रोत्साहित करते रहते हैं। टीम ने कोई समयसीमा तय नहीं की थी, हमारा ध्यान जल्द से जल्द काम पूरा करने पर था। हमारे लड़के 48 घंटे तक बारिश में कड़ी मेहनत कर रहे थे और हम उनके साथ थे।”
स्थानीय निवासियों का सहयोग
मेजर सीता ने स्थानीय निवासियों और अधिकारियों से मिले सहयोग की सराहना की। उन्होंने कहा कि उनकी टीम ने विपरीत परिस्थितियों में भी बिना रुके काम किया और जल्द ही पुल का निर्माण पूरा किया।
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